उसकी गरीबी

  वह झाड़ियों से निकलती है. कराहती हुई अपने बदन को साफ  करती हैं .सिर पर पत्तों का ढेर लगा हुआ है और एक असहनीय पीड़ा के साथ चलते हुए धीरे-धीरे अपने घर को पहुंचती हैं. जब उसकी मां ने इकलौती बेटी की यह हालत देखती है तो पूछती है क्या हुआ बेटा ?कहीं गिर गई थी क्या? अपने आंसुओं को छुपाती हूं बनावटी मुस्कान के साथ कहती है हां मां रस्ते में एक गाय के धक्के से में गिर गई. मां तत्काल उसके कपड़े साफ करने लगे और सिर पर लगे हुए पत्तों को साफ करने   लगी तभी उसकी नजर बेटी के गले  पर पड़ती है. बेटी के गले में एक ताजा अभी कुछ देर पहले लगा हुआ नाखूनों का निशांत  था. कुछ पल तो है अनजान बन गई लेकिन उसका ह्रदय हलक में आकर फस गया और कह ही बैठी बेटा! यह क्या हुआ तुझको? यह किस चीज का निशान है. बेटी ने घबराकर अपने निशान को छुपाते हुए कहा कुछ नहीं मां ऐसे ही. कहकर उसने अपने आंसुओं को छुपाने की भरसक कोशिश की लेकिन असफल रही. अब तक मां की हिचकी बंध चुकी थी    दोनों मां बेटी एक दूसरे से लिपट कर लगातार घंटों रोती नहीं जब मन हल्का शांत हुआ तो मां ने धीरे से कहा की क्या उसने फिर गलत हरकत की ?बेटी ने केवल हां में ही गर्दन हिलाई बोली कुछ नहीं. .                                             उमा की मां ने गणेश जी अपने पति की बीमारी में ₹10000 बतौर कर्ज लिए थे लेकिन उनके जाने के बाद हाय का कोई साधन न होने की वजह से वह अभी तक वह कर्ज को नहीं चुका  पाई थी.      उसी 10000 की  केवज में गणेश उमा की अस्मत के साथ खेल रहा था आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान हो मां और उनकी मां कुछ कर भी नहीं पा रहे थे.                                                                        कितना दर्द होता है भारत और भारत में रहने वाले ऐसे गंदे ख्याल रखने वाले लोगों के  ऊपर .बहुत क्रोध आता  है यह जानकर कि लोग  कितने  घिनौनी सोच वाले होते हैं . किसी की मजबूरी का फायदा कितने गलत तरीके से उठाते है. सच मानो ऐसे लोगों को जानकर या देखकर उनकी गर्दन काटने की इच्छा होती है. हमारे देश का कानून गलत कार्य करने वालों के लिए सजा देने के लिए काफी लंबा समय लेता है जबकि ऐसे घृणित कार्य करने वालों को तत्काल सजा का प्रावधान होना चाहिए.                                             यह केवल उमा का घर नहीं या उमा ही पीड़ित नहीं है ऐसी हजारों लाखों करोड़ों महिलाएं और बेटियां हैं जो नित्य प्रताड़ित हो  रही हैं  . हमारे देश में हजारों की तादात में नौकरियां निकलती है और हजारों की तादात में लोगों को नौकरियां मिल भी जाती हैं लेकिन मैंने देखा है और पाया है अक्सर वही बिना नौकरी के रह जाते हैं जिनके पास सरकारी अधिकारियों को खुश करने के लिए पैसा नहीं होता. ऐसी स्थितियों में बिना नौकरी के बिना काम धंधे के घर की महिलाओं की स्थिति और पुरुषों की स्थिति निरंतर गिरती जाती है और वह वह कार्य भी करने के लिए सहर्ष तैयार हो जाते हैं जो उन्हें कदापि नहीं करना चाहिए. भारत में हजारों की संख्या में नित्य लड़कियों  को बेचा जाता है या उनके शरीर को खरीदा जाता है आप ही बताइए इससे ज्यादा नहीं तो बात हो सकती है क्या ? मैं तो यही कहूंगी कदापि नहीं. एक तरफ हम महिला को यह बिटिया को दुर्गा मानकर उनका पूजन  अर्चना किया करते हैं     और दूसरी ओर उनकी देह का सौदा करके उनकी परिस्थितियों का फायदा उठाकर उन्हें सड़ी हुई जिंदगी को जीने के लिए  मजबूर करते हैं और पल पल पर उन्हें रोने को और नाना प्रकार की मुसीबतों को झेलने के लिए प्रेरित करते हैं. क्या हम इंसान हैं ? या इंसान कहलाने के लायक है इसका फैसला हमें स्वयं करना है    .  यह सारा गलत काम करते हुए हम भूल जाते हैं कि हमारे घर में भी बहू बेटियां हैं और इंसान की किस्मत पलटने में टाइम नहीं लगता. कब कौन राजा बस जाए और कौन राजा से नौकर हम यह कह नहीं सकते इसलिए इंसान को सदा ऐसे कर्म करना चाहिए जो सराहनीय है प्रशंसनीय हो और आदरणीय हो.

Comments

  1. गरीब इंसान को कुछ भी करने के लिए मजबूर कर देती है गरीबी के चलते इंसान कुछ भी कर कर अपना जीवन यापन करता है.

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