जब ज्ञात सभी को है यह, नारी ही पुरुष की जननी है, फिर क्यों यह पुरुष निरंतर, अनजान बना फिरता है जब नारी नहीं अपने कोख से, जन्मा है और इसको पाला है. फिर यह क्यों करता अधर्म हमेशा, औरत को दाग लगाता है. खुद ही भोगता सुख दुनिया के, औरत को सदा सताता है. कभी बाल खींचता है यह उसके, कभी लातों से लती आता है. खड़ी अकेली वह जब सड़क पर, उसको पुतला कर ले जाता है. तार-तार कर देता कपड़ों को, उसकी लाज वह है चुराता है . बड़े अभिमान से घूमता फिरता, है" कायर" पर" पुरुष "कहलाता है. धिक्कार है इस जीवन को उसके, जो नारी का मान मर्दन कर जाता है. लाखों बेटियां रोती फिरती, कोर्ट कचहरी मैं मंडराती हैं और, लाखो बेटियां घुट- घुट कर के, जीते जी मर जाती हैं. फिरता रहता "रावण" बनकर , लंका अपनी 'आप 'जलाता है . एक तरफ जगदंबा को माने, फिर उसका मान मिटाता है.
जो माता पुरुष को जन्म देती है उसके अस्तित्व को बनाती है आगे चलकर वहीं पुरुष माता के अस्तित्व को बिगाड़ देता है. यह कैसा पुरुष है ?क्या इसे सोचना नहीं चाहिए?
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