अंजाना सफर
एक अनजानी सफर में हम निकल पड़े हैं , यह ज्ञात नहीं है कि सफर क्या है हमारा. लुटिया कंबल और आटा बगल में दवा लिया है, निकल पड़े हैं अब हम तो अनजानी राह में.
सफर हमारा बीतेगा कैसे यह पता नहीं है हमें, राय में हमारी कंकड़ पत्थर होंगे कुछ धूल मिट्टी भी. कहीं पर मैदानी इलाके होंगे कहीं भरे हुए जलाशय, डाकू लुटेरे भी होंगे जो मुझे मार भी डाल सकते हैं.
घबराना नहीं है, राही की परेशानियों को देख कर, निकले हैं जब राह में तो परेशानियों से क्या डरना. हम कायर भी तो नहीं हैं कि किसी बात से डर जाऊं, मैं एक राहगीर हूं जो अपनी राह पर चलती जाऊं.
मैं जानती हूं यह मेरी राह आसान नहीं होगी कहीं, ऐसे ऐसे राहगीर मिलेंगे जो मुझे लौटने पर विवश करेंगे, लड़ेंगे मुझसे मुझे डांट देंगे मारने की भी धमकी देंगे मुझे. इनकी बातों को चुनौती मानकर बस मुझे सीधे जाना है.
विफलता है तो बहुत देखी है मैंने जीवन में हर मोड़ पर, कदम कदम पर पानी सहे हैं अपने ही लोगों के हर पल. मन दुखी नहीं करना है मुझे ,अपने लक्ष्य पर है नजर मेरी. मछली की आंख भेजने की तरह अंधकार भेदना है मुझे .
अभी जो अंधेरा है मेरा डस रहा है मुझे काले नाग की तरह . इस अंधेरे को धीरे धीरे अपने से दूर भगाना है मुझे . परिस्थितियों का सामना करने के लिए एक सोच लिया है, अब मुझे अपना किनारा पाना है ,अपनी मंजिल पाना है,.
अपनी मंजिल पाने के लिए मुझे किसी भी परिस्थिति का मुकाबला करना पड़ेगा. मैं करूंगी .डरूंगी नहीं.
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