सुख और दुख
कहते हैं कि मरने पर इंसान ,अच्छे कर्मों के करने कारण स्वर्ग में जाता है और बुरे कर्मों के करने कारण ,वह नरक में जाता है.
मेरा मानना है स्वर्ग नरक कहीं बाहर नहीं है .इसी जन्म में इसी भूमि पर इंसान अपने कर्मों के आधार पर सुख और दुख दोनों को प्राप्त कर लेता है. यदि कोई बहुत ज्यादा वैभव पूर्ण जीवन जी रहा है उसके जीवन में संपूर्ण सुखों की प्राप्ति है तो आप मान कर चलिए कि वह ,वर्तमान में स्वर्ग का जीवन जी रहा है ,वही उसके लिए स्वर्ग है इसके विपरीत यदि कोई ,जरूरत से ज्यादा दुखी है, छोटी छोटी चीजों के लिए तरस रहा है तो ,मैं यही मानकर चलूंगी की वास्तविक नरक वही व्यक्ति भोग रहा है, जिसे छोटी-छोटी दैनिक जीवन की चीजों के लिए भी दूसरों के सामने अपने दोनों हाथों को फैलाना पड़ रहा है.
स्वर्ग और नरक हम में से किसी ने अपनी आंखों से नहीं देखा है. यह सब तो हम आपने धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन से ज्ञात कर पाते हैं. यदि वास्तविक स्थिति में देखा जाए तो यही सच सामने आता है कि, हम अपने कर्मों के द्वारा ही सुख और दुख की प्राप्ति कर पाते हैं. इस बात को हम उदाहरण के द्वारा इस प्रकार समझ सकते हैं कि,, यदि कोई व्यापारी अपनी दुकान को नित्य ही नहीं खोलता और अपने घर में ही बैठकर आराम से टेलीविजन आदि देखकर और अपने परिवार के साथ रहकर अपने जीवन को व्यतीत करना चाहता है तो ,जाहिर सी बात है वह व्यक्ति ,आगे चलकर बहुत बड़ी मुफलिसी का शिकार होने वाला है क्योंकि वह व्यापारी जो उसका कर्म है ,वह कर ही नहीं रहा है .वह अपनी दुकान को खोल ही नहीं रहा है जिससे ,उसका व्यापार आगे बढ़ सके और उसे धन की प्राप्ति हो उस धन से वह अपने परिवार का भरण पोषण के साथ-साथ विविध प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है .जब वह दुकान ही नहीं खोल रहा है तो, यह सब उसे कैसे प्राप्त होगा ?तो स्पष्ट होता है कि ,व्यक्ति अपने कर्मों के द्वारा ही ,सुख और दुख दोनों की प्राप्ति करता है
उपरोक्त बातों से स्पष्ट होता है कि, हमें अपने कर्मों का निर्वहन सही तरीके से करना चाहिए जिससे हमें अपने आगे आने वाले जीवन में, सुख की प्राप्ति हो सके और हम अपना जीवन यथोचित ढंग से व्यतीत कर सकें.
हमें हमारे सुख और दुख की प्राप्ति ,हमारे द्वारा संपादित किए गए कर्मों के आधार पर ही ,प्राप्त होती है.
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