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कुछ मन का ना मिला

 ऐसे ही बीती जा रही जिंदगी मेरी 'पर 'लगा कर,                  बहुत कुछ मिला फिर भी मेरे मन का ना मिला.                 दुख बहुत मिले इस जिंदगी में कोई सुख ना मिला,                 जो भी मिला मुझे कुछ भी मन का ना मिला.  दिल मिला, दिल वाले मिले ,पति मिला घर वाले मिले,           रिश्तेदार मिले बहुत   और नातेदार भी मिले बहुत सारे.     पड़ोसियों का लगा रहा हरदम  आना जाना घर मेरे ,          जो भी मिला मुझे संतोष किया कुछ भी मन का ना मिला. गरीबी तो मिली थी मुझे बचपन से एक करीबी सखा बनके,   होता रहा गुजारा खाते पीते रहे सुकून से घर के सभी.           जिंदगी जीते -जीते धीरे -धीरे हम इस उम्र के हो आए अब, सुकून आए जिंदगी में मेरी ऐसा कोई सहारा ना मिला     . 
 क्या करूं मैं उसकी बेवफाई का कि, भुलाए नहीं भूल पाते कभी था उसका हाथ मेरे हाथों में ,घूमा करते थे बगीचों में .  जाने कौन सी बात उसकी मेरे दिल पर लगी टूटा दिल      ,     अब सब कुछ सिमट गया उसकी यादों में मेरी यादों में.

उसकी आंखें

 उसकी आंख है ,आंखें हैं कि, समुंदर है कि, गहरा दरिया,         हम ऐसे डूबे उनमें, गहराई इतनी कि डूबते चले गए हम.         रात और दिन सुबह हो या शाम डूबे ही रहते हैं इनमें ,  लाख कोशिश की सभी ने फिर ना निकल पाए इनसे हम.

रात के अंधेरे में

 रात के अंधेरे में मेरा मन निकलता है,                                दूर घनी बस्ती में अपनी हस्ती को तलाश करने.               रात के अंधेरे में मेरा मन नहीं करता है,                            अनसुलझी पहेली के ,जवाब ढूंढने नित्य निकलता है.

जिंदगी को हम सीधा सरल समझ बैठे थे

 जिंदगी को हम सीधा और सरल समझ बैठे थे.                  जब जीने लगे तो इसका रास्ता समझ में आया.                    कई बार गिरे फिर गिरे और  संभले हम  बार-बार ,              जब जीना इसे सीख गए तब इस पर ऐतबार आया.

चोट चोट दिल पर लगती है

 चोट जो दूसरे दे तो मत गम करना दोस्तों,                         उसे तो हम भूल ही जाएंगे कभी ना कभी.                          चोट तो अपनों की  दी हुई होती है जो सीधे,                      मन से उतर कर दिल में  दर्द भर जाती  है